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क्या जनता के लिए सही है, त्रिशंकु सरकार?

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चंडीगढ़ (24 अक्टूबर 2019) डेस्क 16.00 PM IST

अनिर्णायक चुनावी नतीजों से बन रहे समीकरण को त्रिशंकु विधानसभा कहते हैं। आज हरियाणा में यही त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति देखने को मिली। हरियाणा में शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम निर्णय तक किसी भी एक राजनैतिक दल को बहुमत (50 प्रतिशत से अधिक) नही मिल पा रहा था। परंतु ऐसा ना होने पर सबसे बड़े दल को यह हक़ होता है की वो सरकार बनाने का दावा पेश करे।

राज्यपाल के निमंत्रण के बाद अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए किसी भी दल के पास एक हफ़्ते का समय होता है, और यदि राज्यपाल को लगता है कि एक दल के पास बहुमत है तो वो उस दल को सरकार बनाने की अनुमति प्रदान कर सकते है। यदि विपक्ष चाहे तो विधानसभा सत्र के दौरान बहुमत सिद्ध करने की चुनौती मुख्यमंत्री को दे सकता है जिसमें उपस्थित विधायकों में से 50 प्रतिशत मुख्यमंत्री के साथ एवं सत्ता पक्ष के साथ होने चाहिए।

हालांकि हरियाणा में मतदान के बाद दर्जनों सर्वे एजेंसियों ने भाजपा के पक्ष में एग्जिट पोल दिखाए थे। कुछ सर्वेक्षणों ने तो हरियाणा में भाजपा को 80 से भी ज्यादा सीटें मिलने की आशंका जताई थी। लेकिन मतगणना के रुझानों से शुरू हो कर अंतिम फैसले तक भाजपा 45 सीट यानी आधा आंकड़ा भी पार नही कर पाई। वहीं कांग्रेस 30 से ऊपर चल रही थी, और एक मजबूत स्थिति में थी और नई नवेली पार्टी जजपा अपनी पहली पारी में दस सीटों की बढ़त बनाये हुए थी। भली ही कांग्रेस और जजपा दोनों अपने रिकॉर्ड तोड़ रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे ये आंकड़े बढ़ते गए , वैसे वैसे हरियाणा में हंग असेंबली बनती गई।

शाम होते होते निर्दलीय विजयी उम्मीदवारों ने न जाने किस उम्मीद से भाजपा को समर्थन दिया तब जाकर कहीं, भाजपा की लुढ़कती स्थिति सुधरी। अभी तक अपने आप को किंग मेकर समझ रहे जजपा नेता दुष्यंत चौटाला ने अपनी चाबी को नहीं घुमाया। यूं तो हरियाणा में भाजपा के पास बहुमत का पूरा आंकड़ा तो नही है, लेकिन सदन में सबसे बड़ा दल होने के कारण सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है।

अब सवाल ये उठता है, कि क्या ‘त्रिशंकु विधानसभा’ या ‘हंग असेंबली’ जनता के लिए कितनी हानिकारक या फायदेमंद है?

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